'ईरानी जहाज का डूबना भारत की गलती...?', हिंद महासागर में अमेरिकी हमले को लेकर क्या कह रहे एक्सपर्ट
हिंद महासागर में 4 मार्च 2026 को हुए एक बड़े घटनाक्रम ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। अमेरिकी पनडुब्बी ने श्रीलंका के तट के पास अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में ईरानी युद्धपोत 'IRIS डेना' (IRIS Dena) को टॉरपीडो हमले से डुबो दिया। इस हमले में 80 से ज्यादा ईरानी नाविकों के मारे जाने की खबर है।
लेकिन इस घटना के बाद सबसे बड़ा सवाल और विवाद भारत को लेकर खड़ा हो गया है। दरअसल, यह ईरानी जहाज भारत के विशाखापत्तनम में आयोजित 'मिलन-2026' (MILAN-2026) नौसैनिक अभ्यास में हिस्सा लेकर वापस लौट रहा था। सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक यह बहस तेज है कि क्या एक 'मेहमान' जहाज के डूबने में भारत की कोई कूटनीतिक या रणनीतिक नाकामी है? आइए जानते हैं कि इस पूरे विवाद पर देश के जाने-माने रक्षा और रणनीतिक एक्सपर्ट्स का क्या कहना है।
घटनाक्रम: आखिर हुआ क्या था?
- मेहमान नवाजी: ईरानी जहाज 'IRIS डेना' भारत के न्योते पर बहुपक्षीय नौसैनिक अभ्यास में शामिल होने भारत आया था।
- अचानक हमला: अभ्यास के बाद वापसी के दौरान, श्रीलंका के तट से करीब अमेरिकी पनडुब्बी ने इस पर हमला कर दिया।
- अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र: यह हमला भारत के विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) के बाहर यानी इंटरनेशनल वॉटर्स में हुआ।
क्या इसमें भारत की कोई गलती है? एक्सपर्ट्स की राय
इस संवेदनशील मुद्दे पर रक्षा और कूटनीति से जुड़े विशेषज्ञों की अलग-अलग राय सामने आई है:
1. संदीप उन्नीथन (रक्षा विशेषज्ञ)
इनका स्पष्ट मानना है कि इसमें भारत की कोई सैन्य या तकनीकी गलती नहीं है।
- भारत का अधिकार क्षेत्र तट से केवल 200 नॉटिकल मील (EEZ) तक सीमित है, और यह घटना उस सीमा के बाहर हुई।
- ईरानी जहाज के कैप्टन को पता था कि उनका देश अमेरिका के साथ संघर्ष की स्थिति में है। ऐसे में उन्हें भारतीय नौसेना से सुरक्षा (Escort) या किसी भारतीय बंदरगाह पर शरण (Shelter) की मांग करनी चाहिए थी, जो उन्होंने नहीं की।
- भारत किसी भी जहाज के अपने क्षेत्र से सुरक्षित बाहर जाने के बाद उसके साथ होने वाली घटनाओं के लिए जवाबदेह नहीं हो सकता।
2. कंवल सिब्बल (पूर्व विदेश सचिव)
पूर्व राजनयिक कंवल सिब्बल ने इस घटना को भारत के लिए सैन्य नाकामी नहीं, बल्कि एक 'नैतिक' मुद्दा बताया है।
- उनका तर्क है कि अगर भारत ने जहाज को अभ्यास के लिए आमंत्रित नहीं किया होता, तो वह उस समय वहां नहीं होता।
- उन्होंने अमेरिका की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि अमेरिका ने भारत की 'संवेदनशीलता' को नजरअंदाज किया है। एक मेजबान देश के बिल्कुल पड़ोस में उसके मेहमान जहाज को डुबोना कूटनीतिक शिष्टाचार के खिलाफ है।
3. डॉ. ब्रह्मा चेलानी (रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ)
डॉ. चेलानी इसे भारत के लिए रणनीतिक रूप से एक असहज स्थिति मानते हैं।
- उनका मानना है कि अमेरिका ने इस कदम से भारत के समुद्री पड़ोस (Maritime Backyard) को युद्ध क्षेत्र में बदल दिया है।
- यह घटना इस बात पर सवाल उठाती है कि हिंद महासागर में शांति और स्थिरता बनाए रखने की भारत की कोशिशों के बीच अमेरिका जैसे देश किस तरह दखल दे रहे हैं।
4. लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) डी.पी. पांडे
जनरल पांडे का रुख एकदम स्पष्ट है। उनका कहना है कि भारत की जिम्मेदारी उसकी समुद्री सीमाओं के साथ खत्म हो जाती है। अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में एक बार जहाज के प्रवेश करने के बाद, भारत का उस पर कोई नियंत्रण या जिम्मेदारी नहीं रह जाती है।
निष्कर्ष (Conclusion)
ईरानी युद्धपोत का डूबना हिंद महासागर की भू-राजनीति में एक बड़ा तनाव पैदा कर चुका है। तकनीकी और सैन्य कानूनों के हिसाब से देखें तो इसमें भारत की कोई गलती नहीं है, क्योंकि घटना अंतरराष्ट्रीय जलसीमा में हुई और जहाज ने भारत से कोई आपातकालीन मदद नहीं मांगी थी। हालांकि, एक मेजबान देश होने के नाते रणनीतिक रूप से यह भारत के लिए एक कूटनीतिक चुनौती जरूर है, क्योंकि इससे यह संदेश जाता है कि महाशक्तियां भारत के प्रभाव वाले क्षेत्रों में भी अपने युद्ध बेधड़क लड़ रही हैं।
लेखक: Arjunsingh

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